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वुद्व धर्म के चार आर्य सत्य
गौतम बुद्ध, बौद्ध धर्म के संस्थापक थे।वो भारत के महान दार्शनिक, धर्मगुरु, महान समाज सुधारक थे।सत्य वचन वोलना और अहिंसा को परम धर्म मानना महान आत्मा गौतम बुद्व ने ईस्वर की अस्वीकार करते हुए धर्म प्रचार किया था। और लोगों को भी इसी मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित किया।
गौतम बुद्ध का जन्म 483 और 563 ईस्वी पूर्व के बीच कपिलवस्तु के पास लुंबिनी में हुआ था।उनके पूरा नाम सिद्धार्थ था। कपिलाबस्तु के शाक्य राजा शुद्धोदन उनके पिता थे उनकी माता के नाम थे मायादेवी ।गर्भावस्था में महारानी महामाया देवी अपने बच्चे को जन्म देने के लिए पीहर जाते हुए रास्ते में प्रसव वेदना हुई और उन्होने लु्ंबिनी नामक जगह में सुंदर वालक को जन्म दिया ।बालक के जन्म से महाराज शुद्धोदन की पुत्र प्राप्ति की इच्छा पूर्ण हुई थी, क्योंकि उनके बहुत दिनों से कोई बच्चा नहीं थी।इसलिए बालक का नाम उन्होंने सिद्धार्थ रखा गया जिनके नाम का अर्थ है सिद्धी प्राप्त करना।लेकिन सिद्धार्थ के जन्म के 7 दिन बाद मायादेवी का निधन हो गया था। इसके बाद उनकी बहन प्रजावती गौतमी को राजा शुद्धोधन ने शादी की और सिद्धार्थ का पालन पोषण महाप्रजावती गौतमी ने किया था। इसलिए उनके नाम नाम गौतम हो गया।
सिद्धार्थ की जन्मपत्री देखकर ज्योतिषी डर गई दी। उन्होंने भविष्यवाणी की थी कि वो बड़ा होकर राजा नहीं बनेगा बल्कि वो विश्व के महान संत बनेगा। यह सुनकर पिता शुद्धोधन को बहुत चिंता हुई । क्योंकि सिद्धार्थ के पिता चाहते थे कि वे उनके बाद राज सिंहासन को संभालें और राज्य का शासन करे।
सिद्धार्थ बचपन से ही करुणामय, दयालु एकान्तपप्रीय और भावुक स्वभाव के थे।इस कारण सिद्धार्थ के पिता बहुत चिन्तित रहते थे और राजा ने उनके आमोद-प्रमोद के लिए महल में सभी इंतजाम कर दिए थे।लेकिन बड़े होने पर भी उनकी स्वभाव नहीं बदली । गुरु विश्वामित्र के पास गोतम ने वेद और उपनिषद् के साथ साथ ही राजकाज और युद्ध-विद्या ,कुश्ती, घुडेदौड़, तीर-कमान, रथ हांकन का भी शिक्षा ली। हर सीज में वह आवल रहे थे उनकी बराबरी कोईनहीं कर सकता था।
पर भावुक के कारण पिता ने सोलह वर्ष की उम्र में दंडपाणि शाक्य की सूंदर कन्या यशोधरा के साथ विवाह करा दिया। विवाह के कुछ वर्ष बाद यशोधरा ने एक पुत्र का जन्म दिया जिसका नाम राहुल रखा गया। परंतु सिद्धार्थ ने पति और वाप का फर्ज नहीं निभा पाया।उन्हे पृथ्वी के समस्त सुख प्राप्त थे, किन्तु मन में शान्ति नही थी। क्योंकि एक दिन वे भ्रमण के लिए निकले तो रास्ते में एक रोगी को देखा उससे उनके मन दुखी हो गया ।और एक दिन ऐसे ही जब वह महल से वाहर गया तो उन्होंने एक बृद्ध को देखा। जिसे देखकर सिद्धार्थ का मन विचलित हो गया और वे उसके कष्ट के बारे में सोचने लगा और हेरान हो गया।और एक दिन जब एक मृतक को देखा तो हर व्यक्ति के जीवन की सच्चाई का पता चला तो वे बेचैन हो उठे। एक दिन एक भीक्षु ने उनको जीवन के गति असलियत में क्या है वे वताया तब उनके जीवन को वैराग्य के मार्ग की तरफ मोङ दिया।उनसे मिलते ही चेहरे पर संतोष दिखाई दिया, और सिद्धार्थ प्रभावित हुए और उन्हें सुख की अनुभूति हुई। अपने परिवारिक जीवन से दूर और घर को त्याग करने का फैसला लिया फिर एक रात्रिकाल में जब महल में सभी सो रहे थे सिद्धार्थ चुपके से उठे और पत्नी एवं बच्चों को सोता ही छोड़ कर गृह त्यागकर ज्ञान की खोज में निकल पङे। उसके बाद वो इधर उधर जीवन का रहस्य जानने के लिए संत के पास रहने लगे। पर न ही उनको रहस्य का पता चला।अंत में वो बिहार के राजगीर में जाकर अपना तपस्वी जीवन शुरू किया।उसके बाद गौतम जाकर गया पहुंचे।उस दौरान वैसाखी पूर्णिमा का दिन पेड़ के नीचे बैठ के ध्यान लगाने लगे।तभी उन्हें सत्य की खोज मिली और उनको एक दिव्य रोशनी ने घेर लियाऔर उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुई । उनको तब ‘बुद्ध ‘कहने लगी, जिस पेड़ के नीचे बैठकर वो ध्यान लगाया उस पेड़ ‘बोधिवृक्ष’ के नाम से प्रसिद्ध हुआऔर गया को भी ‘वुद्धगया’ कहन लगेे ।ज्ञान प्राप्ति के बाद बुद्ध सारनाथ पहुंचे । भगवान गौतम बुद्ध ने अपने महान विचारों और उपदेशों से दुनिया को एक नया रास्ता दिखाया बुद्ध के उपदेशों का लोगों पर गहरा प्रभाव पड़ा उनके धर्म से समाज में परिवर्तन लाने की कोशिश की। कठोर तपस्या और साधना से वुद्वदेव को चार आर्य सत्य की सन्धान मिले थे।वुद्व दर्शन में इन्हें ‘चत्वारी आर्य सत्यानि’ के नाम से जाने जाते है – दुःख है, दुःख समुदय, दुःख निरोध और दुःख निरोध मार्ग।
पेहला आर्य सत्य- दुःख है
पेहला आर्य सत्य यह है की जन्म से लेकर मृत्यु तक जीवन दुःख और असंतोष से भरा हुआ होता है।सुख होते हैं, परंतु वो कभी स्थायी नहीं होते,बीमारी, निराशा, अपने परिवारजनों के मृत्यु, चिंता और असंतोष आदि सभी दुखों का कारण है। कोई भी सुख कभी स्थायी नहीं होती न ही यह पूरी तरह से संतोष प्रदान करते है, और थौरी समय के बाद यह सुख भी दुख में बदल जाता है। जीवन की हर उतार-चढ़ावों में सुख-शांति पाने के लिए जो भी तरीके अपनाए कभी कभी वो सभी ने अधिक समस्याएं उत्पन्न करते हैं।फलस्वरूप फिर दुःख मिलते है।
द्वितीय आर्य सत्य-दुख के कारण है (दुःख समुदय)
पृथ्वी में हर घटनाओं के पीछ एक कारण होता है।अकारण ही कोई घटना उत्पन्न नहीं होते हैं।समुदय का अर्थ है ‘उदय’। दुःख-समुदय का अर्थ है ‘दुःख उदय होता है’।दुःख का भी कारण होता है।बुद्ध ने दुःख की उत्पत्ति के कारण पर विचार प्रकट किया है। प्रत्येक वस्तु के उदय का कोई न कोई कारण अवश्य होता है। दुःख का भी कारण है। कार्यकारण को बुद्ध ने प्रतीत्यसमुत्पाद के नाम से नामाकरण किया। प्रतीत्य का अर्थ है ‘किसी वस्तु के उपस्थित होने पर’ और समुत्पाद का अर्थ है ‘किसी अन्य वस्तु की उत्पत्ति’।द्वितीय आर्य सत्य में गौतम बुद्ध ने दुःख की उत्पत्ति के कारण पर विचार प्किया है ।दुःख का भी कारण है।प्रतीत्यसमुत्पाद एवं कार्यकारण सिद्धांत पर ही दुःख के कारण आधारित है ।वुद्ब ने इस सिद्धांत को ‘द्वादश-निदान’ कहते है। दुःख के कारण बारह कड़ियों (निदान) में जोड़ें रहते हैं।और चक्र की जैसे घूमती रहती है। मृत्यु के बाद भी ये चक्र रुकता नही है और पूनर जन्म से शुरू हो जाता है ।इसलिए इसे जन्म-मरण चक्र कहते है इस द्वादस निदान के कारण आदमी बार बार जन्म लेते है।ये होता है अविद्या और अज्ञानता के कारण। इसलिए वुद्ब ने अविद्या को समस्त दुःखों का मूल कारण वताया है।ये द्वादश निदान नीचे दिए गए हैं-
- अविद्या,
- संस्कार (कर्म),
- विज्ञान (चेतना),
- नामरूप,
- षडायतन (पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ व मन और उनके विषय),
- स्पर्श (इंद्रियों और विषयों का सम्पर्क),
- वेदना (इन्द्रियानुभव),
- तृष्णा (इच्छा),
- उपादान (अस्तित्व का मोह),
- भव (अस्तित्व),
- जाति (पुनर्जन्म),
- जरामरण (दुःख) |
तीसरा आर्य सत्य: दुःख निरोध अर्थात दुख का यथार्थ रोधन
बुद्ध ने कहा कि दुख के कारण को रोध सकते है। यदि किसी कारणवश दुःख के कारण को रोका जाए तो उसका परिणाम उत्पन्न नहीं होगा। यदि हम अविद्या को समाप्त कर दें तो दुख फिर हमारे जीवन में कभी नहीं आएगा। बुद्ध ने अपने तृतीय आर्य-सत्य में कहते है कि निर्वाण द्वारा दुःख को रोक सकते है इसलिए उन्होंने निर्वाण की स्वरूप का व्याख्या की है। निर्वाण का अर्थ है वूझा दिया परंतु इसका मतलब ये नहीं कि जीवन का अन्त है, बल्कि निर्वाण प्राप्त करने से दुःख-निरोध होता है। और निर्वाण की प्राप्ति इस जीवन में भी सम्भव है। वुद्व के अनुसार मानव जीवन उसके पूर्वजन्म के कर्मो का फल होता है, इसलिए जब तक कर्म रहेगा तवतक शरीर भी समाप्त नही होता है इसलिए निर्वाण-प्राप्ति के बाद भी शरीर विद्यमान रहता है।लेकिन दुःख को दूर कर सकते है।
चौथा आर्य सत्य – दुःख-निरोध-मार्ग (दुःखनिरोधगामिनी प्रतिपद्)
चतुर्थ आर्य-सत्य में गोतम वुद्ब ने निर्वाण प्राप्त करने के लिए ‘अष्टांगिक मार्ग’ की विचार की है। ये मार्ग एक मार्गदर्शन है जिस पर चलकर मानव को निर्वाण प्राप्ति हो सकती है।
१.सम्यक् दृष्टि – चार आर्य सत्य को उपलब्धि करके उन्हें स्वीकार करना और उनपर विस्तार से आलोचना करके विस्वास करना। सम्यक दृष्टि का अर्थ है कि हम जीवन में चार आर्य सत्यों को समझें और सुख का सही अवलोकन करें।
सम्यक् संकल्प – नैतिक विकास से मानसिक शान्ति मिलती है। और उसके लिए जीवन में अच्छे संकल्प लेना जरूरी होता है।चार आर्य सत्य के मार्ग पर चल कर दुःख से छुटकारा पा सकते है। पार्थिव बस्तूउओ के प्रति ज्यादा आसक्ति जैसे भोग विलास, हिंसा आदि वर्जन करने का प्रयास को ही सम्यक संकल्प कहता है।
सम्यक् वाक् – झूट न बोलना,हानिकारक बातें न करना और सत्य को अपनाना ही जीवन की प्रतिज्ञा होनी चाहिए। परनिंदा, झूठ बोलना, हानिकारक बातें आदि को परिहार करके सत्य की साथ देना अनिवार्य है।
सम्यक् कर्मान्त – हानिकारक कर्में न करके खुद को संयम करना और साथ में अहिंसा, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, सत्य और मादक द्रव्यों को वर्जन ये पंचशील को ही सम्यक करमान्त वोलता है। पंच रिपू को अपने आप दमन करके निष्काम कर्म करने से निर्वाण प्राप्त हो सकते है।कर्म चक्र से छूटने के लिए खुद को शुद्धि करना जरूरी है।
सम्यक् आजीव – काम ,क्रोध, लोभ ,द्वेष और दुराचार आदि त्याग करने से सिद्धि प्राप्त होती है।हानिकारक व्यावहार से दूसरों को ठेस पहुंचा सकते है।
यदि कोई अपने सुख के लिए किसी अन्यायपूर्ण उपाय से जीवनयापन करते है तो इसका परिणाम इस जीवन में ही भुगतना पड़ेगा। न्यायपूर्ण जीविकोपार्जन आवश्यक है। इसी को ही सम्यक आजीव कहते है।वुद्वदेव के अनुसार वन्य प्राणियों की हत्या, मादक द्रव्यों के विक्री, गणिका वृत्ति आदि से जीवीका अर्जन करना वर्जित है।
सम्यक् व्यायाम – वुद्व ने सबको शुभ की उत्पत्ति और अशुभ का निरोध करने के लिए निकृष्ट चिंता को मन से निकल कर और उसको निवारण करने का प्रयत्न करने को कहा। सत्य चिंता का विचार से जीवन को उपलब्धि करने से शांति मिलती है,वहीं सम्यक वयाम है।
सम्यक् स्मृति –वुद्व के अनुसार य पार्थिव जगत और शरीर क्षणस्थाई होते हैं। ये सबको अनुभव करना जरूरी होता है।इसके उपलव्धि से चित्त में एकाग्रता का भाव आता है मनुष्य को भोग-विलास से दूर रखते है। चार आर्य सत्य को विचार और भावनायों में स्मरण करके खुद को शुद्धि नवाने की प्रयास को सम्यक स्मृति कहते है।
सम्यक् समाधि – उपरोक्त सात मार्ग के अभ्यास से साधक ने चित्त की एकाग्रता के द्वारा मन को शांत रखने की कोशिश करते है। इस समय समाधि के जरिए निर्वाण प्राप्त कर सकते है। इस समाधि में चार स्तर है। आनंद, उल्लास, आसक्तिहीनता और प्रशस्ति। पहली स्तर में ध्यान के समय चार आर्य सत्य को उपलब्धि करने से मन में आनंद उत्पन्न होती है और सुख की अनुभूति होती है। द्वितीय स्तर पर चार आर्य सत्य की ऊपर विस्वास होने से साधक को शुद्धि मिलती है और संशय दूर होती है। तृतीय स्तर पर मनुष्य के मन शुद्ध रहते है और भोग-विलास प्रीति अनुभूति आदि से साधक उदासीन हो जाता है।चतुर्थ स्तर में साधक सम्पूर्ण रूप से आत्मसमाहित हो जाता है और ये परिपुर्न रूप से ज्ञान प्राप्ति की अवस्था है। इसी स्तर में साधक को निर्वाण प्राप्ति होती है।
अष्टांगीक मार्ग को तीन स्कन्ढ में विभक्त किया गया है। प्रज्ञा,शील और समाधि।सम्यक ज्ञान को प्रज्ञा कहते है।शील का अर्थ है सदासरण। और समाधि की अर्थ है ध्यान। ये मार्ग है दुःख मुक्ति का पथ जिसके प्रयास से मनुष्य को जीवन की दुःख से परित्राण मिलती है।
गौतम बुद्ध ने लोगों को सच्चाई के मार्ग अपनाने का ज्ञान दिया। गौतम बुद्ध को हिन्दू धर्म में भगवान विष्णु का रूप मान कर भगवान बुद्ध कहते है।
प्रीति रेखा बरा
सहकारी अध्यापिका
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Priti Rekha Bora
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